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जीरो बजट यानी प्राकृतिक खेती अपनाएं और दोगुना फायदा उठाएं, जानें प्राकृतिक खेती के फायदे

Zero Budget Krishi
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जीरो बजट यानी प्राकृतिक खेती देसी गाय के गोबर और गौमूत्र पर आधारित है। एक देसी गाय के गोबर और गौमूत्र से एक किसान तीस एकड़ जमीन पर जीरो बजट खेती कर सकता है। देसी प्रजाति के गौवंश के गोबर और मूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत और जामन बीजामृत बनाया जाता है। इनका खेत में इस्तेमाल करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की बढ़ोतरी के साथ-साथ जैविक गतिविधियों का विस्तार भी होता है। जीवामृत का महीने में एक या दो बार खेत में छिड़काव किया जा सकता है। जबकि बीजामृत का इस्तेमाल बीजों को उपचारित करने में किया जाता है। इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाजार से किसी तरह की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। फसलों की सिंचाई के लिये पानी और बिजली भी मौजूदा खेती-बाड़ी की तुलना में 10 प्रतिशत ही खर्च होती है।

कितनी और कैसे फायदेमंद है जीरो बजट यानी प्राकृतिक खेती

गाय के हफ्ते भर के गोबर और गौमूत्र से निर्मित घोल का खेत में छिड़काव खाद का काम करता है और जमीन की उर्वरकता को भी कम नहीं होने देता। इसके इस्तेमाल से एक ओर जहां गुणवत्तापूर्ण उपज होती है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन लागत करीब शून्य रहती है। कई किसान अपने खेत में प्राकृतिक खेती कर उत्साह वर्धक सफलता हासिल कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि देसी गाय के गोबर और गोमूत्र आधारित जीरो बजट वाली प्राकृतिक खेती कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित हो रही है।

वहीं प्राकृतिक खेती के सूत्रधार महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर की मानें तो जैविक खेती के नाम पर जो लिखा और कहा जा रहा है, वो सही नहीं है। जैविक खेती रासायनिक खेती से भी खतरनाक है और विषैली-खर्चीली साबित हो रही है। पालेकर का कहना है कि वैश्विक तापमान वृद्धि में रासायनिक खेती और जैविक खेती एक महत्वपूर्ण यौगिक है। वर्मीकम्पोस्ट का जिक्र करते हुये पालेकर कहते हैं ये विदेशों से आई विधि है और इसकी ओर सबसे पहले रासायनिक खेती करने वाले ही आकर्षित हुए हैं, क्योंकि वो यूरिया से जमीन के प्राकृतिक उपजाऊपन पर पड़ने वाले प्रभाव से वाकिफ हो चुके हैं।

जीरो बजट खेती में देसी बीज का इस्तेमाल

जीरो बजट प्राकृतिक खेती में हाइब्रिड बीज का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसकी जगह पर पारस्परिक देशी उन्नतशील प्रजातियों का इस्तेमाल किया जाता है। इस विधि से खेती करने से किसान को बाजार से खाद और उर्वरक, कीटनाशक और बीज खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। जिससे उत्पादन की लागत शून्य रहती है। इस प्रणाली में एकल कृषि पद्धति को छोड़कर बहुफसली खेती की जा सकती है। यानि एक बार में एक फसल ना उगाकर उसके साथ कई फसल उगा सकते हैं।

कहां-कहां होती है जीरो बजट खेती

आंध्र प्रदेश ऐसा पहला राज्य है जहां जीरो बजट खेती को पूरी तरह से अपना लिया गया है। साल 2024 तक राज्य सरकार ने सभी गावों तक जीरो बजट फार्मिंग को पहुंचाने का लक्ष्य रखा हुआ है। प्रदेश सरकार ने साल 2015 में जीरो बजट प्राकृतिक खेती को पायलट प्रोजक्ट के तौर पर कुछ गांव में इस्तेमाल किया था। अब प्रदेश के लगभग 5 लाख किसान जीरो बजट खेती कर रहे हैं। इसके अलावा हिमांचल प्रदेश सरकार ने जीरो बजट प्राकृतिक खेती को अपने राज्य में बढ़ावा देने के लिए परियोजना शुरू की है।

जीरो बजट प्राकृतिक खेती का पर्यावरण पर असर

कृषि वैज्ञानिकों और जानकारों के मुताबिक फसल की बुवाई से पहले वर्मीकम्पोस्ट और गोबर खाद खेत में डाली जाती है और इसमें निहित 46 प्रतिशत उड़नशील कार्बन हमारे देश में पड़ने वाली 36 से 48 डिग्री सेल्सियस तापमान के दौरान खाद से मुक्त हो वायुमंडल में निकल जाता है। इसके अलावा नायट्रस, ऑक्साइड और मिथेन भी निकल जाती है और वायुमंडल में हरितगृह निर्माण में सहायक बनती है। हमारे देश में दिसंबर से फरवरी तीन महीने ही ऐसे हैं जब तापमान उक्त खाद के इस्तेमाल के लिये अनुकूल रहता है। वहीं मिली जानकारी के मुताबिक अब तक देश में करीब 40 लाख किसान इस विधि से जुड़े हुए हैं।

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