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क्या आप जानते हैं भारतीय नस्ल की इन 18 गायों के बारे में

Punganur dwarf cattle
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भारत में प्राचीन काल से ही पशुओं का पालन किया जाता है। भारत में गाय पालने की महत्ता हिंदू धार्मिक ग्रंथों में भी बताई गई है। प्राचीन काल से वर्तमान तक पशुपालन लोगों के लिए कई तरह से लाभकारी है। भारतीय गांवों में आज भी लगभग सभी घरों में गाय पालने पर विशेष जोर दिया जाता है। गांव में रहने वाले लोगों के अजीविका साधन खेती और पशुपालन ही है। आज के दौर में गायों के पालन पर कई प्रदेश की सरकार विशेष योजनाएं भी चला रही है। लेकिन शहर के कई लोगों को गायों की कई नस्लों के बारे में पता नहीं है, इस लेख में हम आपको भारतीय नस्लों की गायों के बारे विस्तार से बताने जा रहे हैं। जिसमें आपको भारतीय नस्ल की गाय व उनकी विशेषताओं के बारे में पता चलेगा। भारत में मुख्य रूप से गायों को तीन भागों में वर्गीकृत किया जाता है जैसे दुधारू, बहुउद्देशीय व भार ढोने वाली नस्ल। फिलहाल इस लेख में हमने सभी वर्गों को एक साथ ही बातने का प्रयास किया है। चलिए जानते हैं भारतीय नस्ल की गायों के बारे में।

  1. साहीवाल

गाय की इस नस्ल की खास बात ये हैं कि इस भारत के किसी भी क्षेत्र में रखा जा सकता है। इस नस्ल की गाय मुख्यतः पंजाब, गंजिवार व रावी नदी के किनारे के इलाकों में पाई जाती है। इस गाय का शरीर लंबा और टांगे छोटी होती हैं। इस नस्ल की अधिकतर गाय लाल रंग की होती है। ब्याने के बाद दस माह तक ये दूध देती हैं। इस नस्ल की गाय प्रतिदिन 10 से 15 लीटर तक दूध देती है।

  1. लाल सिंधी

इस नस्ल की गाय का मुख्य स्थान पाकिस्तान के सिंध प्रांत को माना जाता है। इसका रंग रूप काफी हद तक साहीवाल से मिलता जुलता होता है। इस गाय का रंग लाल बादामी होता है। इसके सिंग जड़ से मोटे व ऊपर से बाहर की ओर निकले होते हैं। एक बार ब्याने के बाद इस नस्ल की गाय करीब तीन सौ दिनों में 200 लीटर दूध देती हैं।

  1. गिर नस्ल की गाय

गुजरात के गिर क्षेत्र में ये गाय मुख्य रूप से पाई जाती है, और इसलिए ही इसको गिर नस्ल की गाय कहा जाता है। इस नस्ल की अधिकतर गायों का रंग पूरा लाल या सफेद या फिर दोनों ही होता है। इसके सींग कान के पास से उगे होते हैं और बाहर की ओर से मुड़े हुए होते हैं। एक बार ब्याने पर इस नस्ल की गाय करीब 1700 से 1900 लीटर तक दूध देती हैं।

  1. थारपारकर

पाकिस्तान के मरुस्थल में थार नामक जगह में ये नस्ल की गाय मुख्यतः पाई जाती है और इसी जगह को इन गायों की उत्पत्ति स्थल भी माना जाता है। इस नस्ल की गायों का रंग सफेद या खाकी भूरा भी होता है। इस नस्ल की गाय एक बार ब्याने पर करीब 1500 लीटर दूध देती है। खुराक कम होने के कारण ये गाय दूध कम देती हैं।

  1. कांकरेज

कच्छ से अहमदाबाद व आसपास के क्षेत्र को इन गायों का मूल स्थल माना जाता है। इन गायों की मांग विदेशों में भी काफी अधिक हैं। इस नस्ल की गाय खेती करने व दूध देने दोनों ही उपयोग में आती है। इन अधिकतर गायों का रंग लाल, या भूरे रंग का होता है।

  1. नागोरी

इस नस्ल की गाय राजस्थान में  मुख्य रूप से मिलती हैं। इस नस्ल की गाय ज्यादातर दूध का उत्पादन नहीं कर पाती है। ब्याने के कुछ दिनों के बाद ये गाय दूध देती हैं।

  1. पवार

उत्तर प्रदेश का पीलीभीत का पूरनपुर खीरी इसका नस्ल की गाय का मूल स्थान माना जाता है। इस नस्ल की गायों की खासियत होती है कि इनको गुस्सा जल्दी आता है। इसके सींग सीधे व पूंछ काफी लंबी होती है। ये नस्ल की गाय दूध कम देती हैं।

  1. हरियाणा या हरियाणवी नस्ल

इन नस्ल की गाय का मूल स्थान हरियाणा का गुड़गांव, करनाल व दिल्ली आदि माना जाता है। इनका रंग सफेद व हल्के भूरे रंग का होता है। इनका कद काफी बड़ा होता है। इस नस्ल से उत्पन्न बैल खेती के काम आते हैं। इसका ब्याने पर दूध उत्पादन करीब 1150 से 2900 लीटर तक होता है।

  1. दज्जाल

इस नस्ल की गाय का मूल स्थान पंजाब का डेरागाजीखा जिला माना जाता है। ये गाय अन्य गायों की तुलना में कम दूध देती हैं।

  1. निमाड़ी

इस नस्ल की गाय नर्मदा घाटी से पाई जाती हैं। इन गायों की दूध देने की क्षमता अधिक होती है।

  1. राठी या राठ नस्ल

इस नस्ल की गायों का मूल स्थान या उत्पत्ति स्थान राजस्थान माना जाता है। अधिक दूध देने वाली नस्ल में इसकी गिनती की जाती है। राठस जनजाति की वजह से इस नस्ल का नाम राठी पड़ा। राजस्थान के बीकानेर, गंगानगर व जैसलमेर में ये नस्ल अधिक संख्या में पाई जाती हैं। इस नस्ल की गाय प्रतिदिन 6 से 8 लीटर दूध देती हैं।

  1. हल्लीकर नस्ल

कर्नाटक क्षेत्र इस नस्ल की गायों का मूल स्थान माना जाता है। हल्लीकर की नस्ल वाली गाय अधिक मात्रा में दूध देती हैं।

  1. कृष्णा वैली नस्ल की गाय

हल्लीकर की तरह ही इस नस्ल की गाय भी कर्नाटक क्षेत्र में पाई जाती हैं। मुख्य रूप से उत्तरी कर्नाटक में इस नस्ल की गाय खूब मिलती हैं। इसकी सींगे छोटी होती हैं और टांगे छोटी व मोटी होती हैं। एक बार ब्याने पर ये गाय करीब 900 लीटर दूध देती हैं।

  1. खिल्लारी नस्ल

कर्नाटक और महाराष्ट्र में इस नस्ल की गाय मूल रूप से मिलती हैं। इस नस्ल की गायों की सींग लंबी व पूंछ छोटी होती है। ये अधिकतर गाय खाकी रंग की होती हैं। इस नस्ल की गाय एक बार ब्याने पर करीब 220 से 520 लीटर तक ही दूध दे पाती हैं।

  1. अमृतमहल

इस नस्ल की गाय मुख्य रूप कर्नाटक के मैसूर में पाई जाती हैं। इस नस्ल की अधिकतर गायों का रंग का खाकी व माथे और गले का रंग काला होता है। इस नस्ल की गाय कम दूध देती हैं।

  1. बचौर

इस नस्ल की गायों का मूल स्थान बिहार का सीतामढ़ी माना जाता है। इन नस्ल का माथा चौड़ा और आंखे बड़ी होती हैं।

17 . डांगी

ये गाय नासिक, अहमद नगर व अंग्स इलाके में पाई जाती हैं। इस नस्ल की गायों का रंग लाल, सफेद व काला होता है। डांगी नस्ल की गाय कम दूध देती हैं।

18. पुंगानुर गाय

गाय की दुनिया की सबसे छोटी नस्ल जिसे घर में रखने अमीर लोगों के लिए स्टेटस सिम्बल बन गया है. मासूम और खूबसूरत दिखने वाली पुंगनूर ड्वार्फ काउ जिसके कद की ऊंचाई 70 से 90 सेंटी मीटर के बीच होती है और वज़न 115 से 200 किलो के बीच पाया जाता है. आमतौर पर गाय के दूध में 3-3.5 प्रतिशत तक फैट होता है लेकिन पुंगानुर गाय के दूध में 8 प्रतिशत तक फैट होता है. मूल रूप से पुंगानुर गाय आंध्रप्रदेश के चित्तोड़ जिले में पायी जाती है.

हमने इस लेख में देश की कुछ प्रमुख नस्लों को ही शामिल किया है। इसके अलावा भी कई नस्ल की गाय भारत में पाई जाती है। कई क्षेत्रों में कुछ गायों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। अगर कुछ नस्लों को आप जानते हैं और हमने उसे अपने लेख में शामिल नहीं किया है, तो आप उसे कंमेट करके बता सकते हैं।

 

लेखक : विकास आर्य

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